तुझसे दूर हो के समझी मैं
कैसी है ये जिन्दगी.....
सब हैं साथ यहाँ मेरे
पर कोई अपना नही
जो प्यार से मुझे पुकारे
थी जब साथ तेरे
करती थी तुझे तंग
तू डाटती थी मुझे प्यार से
मैं रूठती थी तुझसे
पर, तुझसे दूर हो के समझी
तेरी डाँटो की कहानी
सोचती थी काश ऐसा वक्त आता
जहाँ कोई न होता डाँटने वाला,
मैं होती सपनों की दुनिया में
करती खुद से बातें
नाचती, गाती, झूमती फूलों की बगिया में
पर जब वक्त आया
तो लगा काश तू यहाँ होती
मुझे डाँटने के लिए
मैं सर रख के सो सकती
तेरी आँचल की छाँव में....
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